Sunday, July 20, 2014


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ORIGINAL ARTICLE WRITTEN BY ROMA AND ASHOK CHOUDHARY

दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक विरासत की पहचान उस्ताद मेहदी हसन खां
-रोमा और अशोक चैधरी
किसी भी देश की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत से होती है, जो कि एक विशेष समयकाल में सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियों को प्रभावित करती है। यूं तो दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप का रूढि़वादिता के खिलाफ अपनी एक सांस्कृतिक विरासत है जिसका 700 साल का सुनहरा इतिहास है । उसी विरासत को उस्ताद मेहदी हसन खां जैसे फनकारों ने जि़न्दा रखा और पूरे दक्षिण ऐशियाई उपमहाद्वीप को अपनी नायाब गु़लूकारी व संगीत से नवाज़ा। उन्हीं के जन्मदिन 18 जुलाई उनको श्रद्धांजलि के तौर पर यह लेख प्रस्तुत है।  
यह लेख पाकिस्तान और भारत की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में उस्ताद मेहदी हसन जैसे गायक के उभार व उनके द्वारा मीर, मिजऱ्ा ग़ालिब, फ़ैज़ अहमद ‘‘फ़ैज’’, हबीब जालिब, नासिर काज़मी जैसे इंक़लाबी व कई तरक़्कीपसंद शायरों के साथ उनके संगीत के सफर को समर्पित है। दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप में 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे ने जिस बड़े पैमाने पर कत्लेआम, साम्प्रदायिकता और वैमन्स्य की भावनाओं को फैलाया उसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलती, जिसके पीछे साम्राज्यवादी ताकतों और उनके पिछलग्गू सामंत-अभिजात वर्ग का हाथ था। इस बंटवारे के बाद जिस तरह से दोनों देशों में और इस पूरे उपमहाद्वीप में सामाजिक व सांस्कृतिक ताना बाना टूटा है, उसकी वजह से यह उपमहाद्वीप आज भी दमन, अन्याय, ग़रीबी, व सामाजिक राजनैतिक आर्थिक असमानताओं के संकट से जूझ रहा है और अब पूरी तरह से नवउदारवादी अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद की गिरफ्त में है। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद पकिस्तान की आवाम कई दशकों तक तानाशाह फौजी हुक़्मरानों के साये में जीने को मजबूर हुई। वहां की प्रगतिशील ताकतों ने इस उपमहाद्वीप की सात सौ साल की सांस्कृतिक विरासत जोकि अमीर खुसरो, कबीर, नानक, रैदास, बाबा फरीद, मीर तक़ी ‘‘मीर’’, ग़ालिब, बुल्लाशाह, फ़ैज़, साहिर, नज़ीर अकबराबादी की विरासत से आती है को  अमन, प्रेम ओर मैत्री के सहारे समाज को बांधे रखा। इसी सांस्कृतिक धरोहर को ना सिर्फ जि़न्दा रखने बल्कि इसका दक्षिण ऐशियाई स्तर पर और पूरी दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुल्कों में विस्तार करने में जनाब मेहदी हसन साहब ने एक कि़़रदार अदा किया है, इसलिए हम उनको दक्षिण एशिया के अव्वल दर्जे का मयारी फनकार मानते हैं। उनकी ग़जल गायकी में नई परम्परा का असर पूरे दक्षिण एशिया में खासतौर पर पाकिस्तान, भारत और बंग्लादेश के कई ग़ज़ल गायकों में रहा है। भारत के आधुनिक युग के मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह उसी विरासत की उपज हैं। भारत की सबसे मशहूर गायिका लता जी ने खां साहब के जिन्दा रहते हुए कहा था  ‘‘ उनके गले में भगवान बसता है’’।   
बंटवारे के बाद खां साहब के परिवार ने पाकिस्तान आने के बाद काफी आर्थिक तंगहाली का सामना किया। खां साहब ने उस समाजिक उथल-पुथल के दौर में भी परिवार की आजीविका के लिए संघर्ष तो किया ही, लेकिन साथ-साथ संगीत की पंद्रह पुश्त की उस विरासत को भी जिन्दा रखा। 1970 में रेडियो पाकिस्तान में व बाद में पाकिस्तान टीवी पर दिए गए अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ‘‘पाकिस्तान में ग़ज़ल मर चुकी थी, हिन्दुस्तान में फैज़ाबाद की अख्तरी बाई ने ग़ज़ल को मशहूर किया, इसलिए सन् 1952-53 में जब रेडियो पाकिस्तान में मुझे मौका मिला तो मैं ग़ज़लों की ओर मुड़ा। मैंने जो भी ग़ज़ले कम्पोज़ कीं उनका आधार क्लासिकल था, जो किसी न किसी राग पर आधारित थीं। जैसे ‘‘ये धुआं कहां से उठता है...’’ और ‘‘गुलों में रंग भरे...’’ राग झिंझोटी, ‘‘बात करनी मुझे मुश्कि़ल..’’ राग पहाड़ी और ‘‘रंजिश ही सही...’’ राग यमन से। रागों पर बनी इन ग़ज़लों में जान आ गई और ये अमर हो गई। मैंने यह कोशिश की कि राग भी खराब न हो और सुर भी, राग के आधार पर तर्ज बनाने से सुनने वाले पर भी असर होता है, गाने का असर हो न हो लेकिन राग का असर ज़रूर होता है। राग की आमद इतनी बड़ी होती है कि उसका असर तो जानवर पर भी पड़ता फिर हम तो इंसान हैं। ’’ खां साहब की संगीत के नए फार्मुले की खोज ज़ाहिर है उस समय पाकिस्तान के माहौल की वजह से भी होगी जहां पर जीवन अस्त-व्यस्त था, बंटवारे, हिंसा और लूट के बाद सब अपने जीवन के दर्द को समेटते हुए नए तरीके से आबाद होने में लगे हुए थे। उन्होंने ग़ज़ल की शैली में प्रेम, सोज़ व दर्द की प्रधानता को और भी उभारा, जिसका सहारा उन्हें उच्चकोटि के शायरों की ग़जलों, नज्मों के साथ उनके पुश्तैनी संगीत घराने की विरासत के तालमेल से मिला। उनकी गायकी में राग का चयन, शायर और शायरी का चयन, तलफ़्फ़ुस, लय व ताल की बारीकियां इतनी सूक्ष्मता के साथ शामिल रहीं, जिसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं होती थी। संगीत में शब्द और बोल के महत्व को रागों में स्वरों और श्रुति के इस्तेमाल से उस जज़्बात को उभारा जो कि बेमिसाल है। मज़ेदार बात यह है कि जब वे पाकिस्तान आए तो उन्हें उर्दू नहीं आती थी। जयपुर में उनके वालिद उस्ताद अज़ीम खां द्वारा घर पर ही उन्हें संगीत की तालीम के साथ-साथ हिन्दी और संस्कृत पढ़ाने वाले एक मास्टर से तालीम दिलवाई। उर्दू की समझ और तालीम उन्होंने पाकिस्तान में ली और इस कदर इस भाषा के साथ उनकी आत्मीयता बढ़ी कि उनकी शायरी की समझदारी ऊंचे दर्जे की बन गई। 
उन्होंने पूरे दक्षिण एशिया की पीड़ा के मनोभाव को संगीत में मुख़्तलिफ़ उर्दू शायरी जैसे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, जोश, मोमिन, नासिर काज़मी, कतील शिफ़ाई, ग़ालिब, जालिब, परवीन शाकिर, शहज़ाद के साथ मिला कर इस्तेमाल किया ।  उन्होंने कभी अपने आप को केवल पाकिस्तान से नहीं जोड़ा बल्कि अपने संगीत को दक्षिण एशियाई संगीत का दर्जा दिया। उन्होंने इस बात का बेहतरीन तरीके से जिक्र किया, ‘‘1949-50 में ग़ज़ल को मशहूर करने के लिए मैं दो साल हूट हुआ हूॅ, ये समझाने के लिए कि ग़ज़ल क्या चीज़ होती है। मैं लकीर का फकीर नहीं हूॅ कि रिकार्ड बनके गाना गाऊं, सुर ईश्वर को भी कहते हैं और सुर जि़न्दगी का भी नाम है, सुर आप सुन सकते हैं महसूस कर सकते हैं, लेकिन देख नहीं सकते, रूह की गज़ा है सुर। इसलिए ये मौसिक़ी जो कि एशिया की है हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, बंगाल, मद्रास ये म्यूजि़क हमारा है, जिसमें मिसाल दे सकता हूॅ कि ये जि़न्दा है। मेरी 1954-55-56 की ग़ज़ल आज तक भी जि़न्दा क्यों हैं, क्योंकि मैं अपने एशिया म्यूसिक के अंदर ही हूॅ, मैं इससे बाहर नहीं निकलना चाहता।’’ उनका कहना था कि‘‘ ‘‘1950 तक तो मैं क्लासिकल ही गाता रहा, उसके बाद ज़हनियत में कुछ और बात आ गई, कि गाने वाले को भी चैन मिले और सुनने वाले को भी चैन मिले। मैंने ज़्यादा मुश्कि़लात को लाईट में लिया। ’’ इस जज़्बे ने उन्हें आम जनता के साथ जोड़ा और आम दिलों में संगीत, शायरी और शायरों का बेहतरीन जुड़ाव हुआ।

 उनकी गायी बेहतरीन ग़जल ‘‘वो दिलनवाज़ है...’’ में राग बिहाग का उभार हो या फिर ‘‘अब के बिछड़े....’’ में राग भोपाली का उतरा हुआ स्वर हो, ऐसी अदायगी है जिसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती। ‘‘अब के बिछड़े...’़ गाते-गाते खां साहब खुद बड़ी गहराई के साथ कहते हैं कि ‘‘ये अहमद फराज़ की ग़ज़ल है, इसमें जो फ़राज़ ने तसव्वुर किया है, उसी तरह के सुर का इस ग़ज़ल पर असर है, जो कि उजाड़, बियाबान, फिराक़, बिछोड़ा है। इसमें ऐसे स्वर का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें आप खुशी नहीं महसूस करंेगे। ये राग भूपाली है जिसमें एक सुर ‘ध’ उतरा हुआ है, इसके बारे में आप मालुमात करेंगे तो आपको गवाही मिलेगी कि जिसका रिवाज़ ही नहीं है, ये गाया ही नहीं जाता और न ही गाया गया है। ’’ इसी ग़ज़ल के अगले शेर में ‘‘ ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफा के मोती, .....’’ गाते हुए वे कहते हैं कि यह गाना इतना मुश्कि़ल है, कि इसमें सुर भी बहक सकता है, जिसमें बेसुरा भी हो सकता है’’। संगीत में पन्द्रह पीढि़यों के खानदान से तआल्लुक़ रखने वाले मेहदी हसन भी बहकने की बात इतनी विनम्रता से करते थे। इसी गज़ल को सुन कर मन्ना डे जैसे महान फनकार ने इस ग़जल में सुरों के स्केल को इस्तेमाल करने के लिए खां साहब की ज़बरदस्त हौसलाफ़जाई की थी। 
यूं तो भारत और पाकिस्तान के संगीत की परम्परा एक ही है, लेकिन आज़ादी से पहले अंग्रेज़ी हुकुमत के दौरान जो दमन का माहौल था उस दौरान उत्तर-पश्चिम भारत में उर्दू शायरी व संगीत के अंदर काफी गहराई पैदा हुई, जिसके माध्यम से आम जनमानस ने सांस्कृतिक तरीके से साम्राज्यवादी, सांमती व पूंजीवादी ताकतों के विरोध और प्रतिशोध को मुखर रूप से अभिव्यक्त किया। हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में भी इस तरह की परम्परा रही। बंटवारे के बाद संगीत की यह परम्परा भी बंट गई व पाकिस्तान में जिस तरह का तानाशाही माहौल था, उसने संगीत की एक नई परम्परा का विकास किया जिसकी मिसाल भारत में देखने को नहीं मिलती। 
 राजस्थान के झुनझनू के मौजा लूना में 18 जुलाई 1927 को जन्मे मेहदी हसन कलवंत संगीत घराने के वंशज थे, जिनके पूर्वज राजा मानसिंह के ज़माने से पंद्रह पुश्तों से जयपुर राजदरबार में राजगायक थे। उन्हें संगीत की तालीम उनके पिता उस्ताद अज़ीम खां और चचा उस्ताद इस्माईल खां से मिली थी, जो कि ध्रुपद गायकी में माहिर थे। इन्हीं उस्तादों ने इस संगीत को जयपुर घराने से बाहर राजा नेपाल, बड़ौदा, इंदौर, बीजावर स्टेट और उ0प्र0 के कई राजघरानों में लेजाने का काम किया, जो कि उनके शार्गिद भी थे। घर में संगीत के इस माहौल का इतना असर था, कि मेंहदी हसन महज छह साल की उम्र से ही गाने लगे थे। पाकिस्तान उनके सामने ही बना, वे बंटवारे के केवल 5-6 महीने पहले अपनी फूफी से मिलने पंजाब आए थे और दंगे फसाद में सब कुछ लुट जाने के बाद वे वापिस जयपुर स्टेट में अपने गाॅव नहीं जा सके। उनके पूरे परिवार को भी इस बंटवारे की त्रासदी झेलनी पड़ी और राजदरबार से सड़क पर आने को मजबूर होना पड़ा। मेहदी हसन जैसे गायक की तालीम की जो कहानी है वो भी कम हैरत अंगेज़ नहीं है। एक तरफ़ जहां वे सुर को इतने प्यार व नर्मी से लगाते हैं, उन्हीं नर्म सुरों को साधने के लिए उन्हें इसके एकदम उलट पहलवानी करनी पड़ी और कुश्ती भी लड़नी पड़ी। संगीत, पहलवानी और मशीनरी से लगाव, इन तीनों का तालमेल था उनके व्यक्तित्व में। हालांकि यह सब भी संगीत के अभ्यास का ही एक हिस्सा था, पहलवानी और संगीत के सम्बन्ध को बताते हुए वे कहते हैं कि ‘‘एक फनकार को बनते देर लगती है, बिगड़ते देर नहीं लगती। मेरी संगीत की बुनियाद मेरे बुजुर्गो ने रखी है शायद ही किसी आर्टिस्ट की वो बुनियाद रखी गई हो। गाना सांस का काम है इसलिए गाना गवाने के लिए मेरे चचा दौड़, दंड बैठकें लगवाते थे। उनका कहना था कि गाना भी पहलवानी का काम है। जब में 15-16 साल की उम्र में पहुंचा तो उस वक्त सुबह 2000 दंड बैठक, 3-4 मील की दौड़ लगानी होती थी और शाम को 4 से 7 बजे तक अच्छे पहलवानों के साथ अखाड़े में कुश्ती लड़ना, यह रोज़ की दिनचर्या थी। मेरे चचा छड़ी लेकर मेरे पीछे खड़े रहते थे और सांस लेने नहीं देते थे। इससे सांस पक्का हुआ। गले की तैयारी सुब्हा होती थी, तानपुरे के साथ तान और गायकी की। चाचा ने मुझे इस इल्म से वाकि़फ कराया चूंकि वो पहलवान थे। वे पहलवान भी इसलिए बने चूंकि वो और मेरे वालिद धुप्रद गाते थे, जिसमें सांस और ताकत की ज़रूरत होती थी। जब तक गाने वाले का सांस क़ायम है तब तक वो गाता रहेगा।’’ उनकी पूरी गायकी के पीछे यही तालीम है, जिसे बहुत लोग नहीं जानते हैं। 
पाकिस्तान आने के बाद परिवार को चलाने के लिए उनके पिता लकड़ी की टाल खोलना चाहते थे। जिसका विरोध मेहदी साहब ने किया और कहा कि इतने बड़े दरबार में गाने वाले उस्ताद क्या ‘‘अज़ीम खां टाल वाले’’ कहलाएंगे? उन्होंने अपने संगीत की विरासत को बचाने में उस समय संघर्ष किया जब वे आर्थिक तंगी से गुज़र रहे थे।  उन्होंने जो पैसे टाल लगाने के लिए जमा किए थे, उनमें 10 रुपये से चिचावत में मोटर साईकिल के नट बोल्ट कसने की दुकान खोली, जिसकी जानकारी उन्हें रियासत में गाड़ीयों की मशीन में रूचि के वक्त मिली थी।  यह दुकान काफी अच्छी चली जिसमें उन्हें रोज़ 12 रुपये की कमाई होने लगी। डेढ़ साल में दुकान काफी बढ़ी और फिर मशीन का काम सीखने के लिए वे सकर चले गए। भावलपुर में डीज़ल इंजन बनाना सीखा, पैट्रो इंजीनियर बने फिर फरगुसन कम्पनी से इंजन फिटिंग का डिपलोमा हासिल किया। अपने इस हुनर से उन्होंने डीज़ल इंजन मैकेनिक का गैरज खोला जिसमें उन्हें हज़ारों में कमाई होने लगी थी। लेकिन जब उन्हें रेडियो पाकिस्तान में गाने के लिए निमंत्रण मिला तो उन्होंने यह काम अपने पार्टनर को सौंप दिया था। रेडियो पाकिस्तान से उन्हें गाने के लिए ए ग्रेड आर्टिस्ट की मान्यता मिली तो उन्हें हर प्रोग्राम के लिए 35 रुपये मिलते थे। पहला फिल्मी गाना गाने के लिए उन्हें 1000 रुपये मिले थे । डीज़ल इंजन में माहिर अपने हज़ारों रूपये के अच्छे कारोबार छोड़ते वक्त उनके दोस्तों और कारीगरों ने कहा कि यह काम छोड़ कर क्यों जा रहे हैं? इससे तो नुकसान होगा? तब उन्होंने कहा कि ‘‘अब मुझे मेरी लाईन मिल गई’’। और सन् 1950 में मेहदी हसन ने लाहौर की राह पकड़ी। शुरूआती दौर की पेशेवर गायकी में उनके बड़े भाई पंडित गुलाम कादिर ने उनकी काफी मदद की व उनकी कई मशहूर ग़ज़लों को कम्पोज़ किया। उनके बड़े भाई को पंडित की डिग्री भारत में मिली थी और वे ताउम्र पंडित ही कहलाए। 
वैसे खां साहब काफी परम्परावादी भी थे, जिनका शासक वर्ग के साथ कभी टकराव नहीं रहा, क्योंकि उनको संगीत की विरासत राजा महाराजाओं के संरक्षण में ही मिली थी। लेकिन संगीत के मामले में उन्होंने बहुत सारे बुनियादी क्रांतिकारी परिवर्तन किए, संगीत घरानों की परम्पराओं को बरक़रार रखते हुए भी नई परम्परा  पैदा की जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक पटल पर नयी गतिशीलता आई। उन्होंने हिन्दुस्तानी संगीत परम्परा को नहीं छोड़ा व अपने वतन की संस्कृति से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। उन्होंने ऐसे शायरों का चयन किया जो परम्परावादी विचारों के खिलाफ थे। मिसाल के तौर पर फैज़ साहब की एक गजल ‘‘ दोनो जहां ... का एक शेर ‘‘इक फ़ुरसत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन, देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के’’ इसमें फैज ने कठमुल्लावाद को खुली चुनौती दी, जिसको मेहदी साहब ने पूरी शिद्दत के साथ गाया। इस ग़ज़ल को काफी गायको ने गाया, लेकिन यह शेर नहीं गाया गया। फैज़ ने 1947 में आज़ादी पर सवाल उठाती क्रांतिकारी नज़्म ‘‘ये दाग़ दाग़ उजाला....’’ लिखी थी, जो कि पाकिस्तान राष्ट्र की पोल खोलती है। खां साहब ने ‘‘फ़ैज़’’ की ग़ज़ल ‘‘गुलों में रंग भरे बादे नौ बाहर चले..... ’’ को 50 के दशक में तब गाया जब फ़ैज़ का दर्जा पाकिस्तान में विद्रोही शायर का था। पाकिस्तानी हुक़ूमत फ़ैज़ को कम्युनिस्ट और पाकिस्तान विरोधी मानती थी, जिसकी वजह से उन्हें पांच साल जेल में भी रहना पड़ा था। 1957 में इस ग़जल को गाने के बाद मेहदी हसन की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनी। इसी श्रंृखला में हबीब जालिब की ग़जल ‘‘दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं...’’ को गाकर उन्होंने इस महान क्रांतिकारी शायर के दर्द को दुनिया के सामने पेश किया। स्मरण रहे हबीब जालिब हमेशा पाकिस्तानी हुक़्मरानों के खिलाफ खुलकर लिखने के जुर्म में बार-बार लम्बे समय तक जेल में कैद रहे। मेहदी हसन से पहले शायद ही किसी गायक ने जालिब को गाया। बंटवारे की त्रासदी में ऐसे ही दूसरे शायर नासिर काज़मी ने आम लोगों के अलगावाद को बहुत खूबी के साथ अपनी शायरी में अस्तित्ववादी दर्शन के तहत वर्णन किया। मिसाल के तौर पर ‘‘गुज़र रहे हैं अजब मरहलों से दीदा-ओ-दिल, सहर की आस तो है जि़न्दगी की आस नहीं’’। इस अलगाव को खां साहब ने राग बिहाग में इस तसव्वुर को कायम किया और बिहाग के पूरे लिबास को ऐसे उभारा, जो कि विरले ही सुनने को मिलता है। ग़ालिब, फ़ैज़, फ़राज़, नासिर, जालिब के बाद परवीन ‘‘शाकिर’’ जैसी नारीवादी शायरा की ग़ज़ल ‘‘क़ू-ब-क़ू फैल गई बात शनासाई की......’’इस ग़ज़ल को राग दरबारी का रंग देकर खां साहब ने एक अनोखा तोहफ़ा दिया है।  
 खां साहब का पूरे जीवन में उनका जुड़ाव राजस्थान में अपने पैतृक गांव से रहा और 1978 में अपने गांव गए तो वहां बिजली और सड़क पहुंचाने के लिए गवर्नर से भेंट कर इस काम को पूरा करवाया और साथ ही सड़क बनाने के लिए अपना एक प्रोग्राम कर राजस्थान सरकार को प्रोग्राम से मिले दो लाख भेंट भी किए। अपने कई बड़े कार्यक्रमों में वे राजस्थान की लोक रचना ‘‘ केसरिया बालम....’’ जरूर गाते थे। 
मेहदी हसन खां साहब ने अपनी क्लासिकी संगीत की जिस विरासत को प्रगतिशील मयारी शायरी के साथ जोड़ कर सृजन किया वही साझी सांस्कृतिक विरासत इस पूरे उपमहाद्वीप की धरोहर है और पहचान है। इसके साथ ही साथ यह विरासत लोक संगीत की भी है, जो कि दुखः, तक़लीफ और हिंसा व लोगों पर होने वाले हमलों के खिलाफ़ आवाम को संघर्ष के लिए भी ताकत प्रदान करती है और नफ़रत की दीवारों को तोड़ने में एक अहम कि़रदार अदा कर सकती है। यह संदेश इस उपमहाद्वीप के उन हुक़्मरानों के खिलाफ भी है, जो हिंसा का जवाब हिंसा से देना चाहते हैं और असल में अमन के दुश्मन हंै। खां साहब के जन्मदिन पर हम सभी आम लोगों को इस साझी सांस्कृतिक विरासत को क़ायम रखने व और मज़बूत करने का संकल्प लेना चाहिए। और इस संगीत की सांस्कृतिक विरासत की ताक़त से आने वाले दिनों में समाज के अंदर न्याय, अमन, मैत्री, समानता पर आधारित जनवादी मूल्यों को मजबूत करने के संघर्ष को एक जश्न की तरह देखना चाहिए।
नोट: लेखकगण वनाश्रित समुदायों के साथ कार्य करते हैं। 

Saturday, June 21, 2014

16 जून 2014
बलात्कारी कलवंत अग्रवाल गिरफ्तार,
महिला संगठन की ऐतिहासिक जीत


साथीयों, आज सुबह ही पुलीस अधीक्षक सोनभद्र श्री रामबहादुर यादव ने फोन पर यूनियन की उपमहासचिव सुश्री रोमा को फोन कर यह सूचित किया कि कलवंत अग्रवाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। लेकिन ख़बर को और भी पुख़्ता करने के लिए संगठन के अधिवक्ता श्री विनोद पाठक द्वारा स्वंय सोनभद्र कचहरी से जानकारी ली गई व पता चला कि आरोपी बलात्कारी द्वारा शनिवार 14 जून 2014 को स्वंय जमानत की अर्जी सीजेएम न्यायालय में पेश की गई लेकिन उसकी जमानत तुरंत खारिज कर दी गई व न्यायाधीश द्वारा उसे जेल भेज दिया गया। बलात्कारी कलंवत अग्रवाल की गिरफ्तारी निश्चित रूप से महिला आंदोलन की एक बड़ी जीत है जो कि पिछले पांच वर्ष से अपने रसूख और पैसे की वजह से बचता चला आ रहा था। यह आंदोलन उसी वक्त चलाया जा रहा था जब उ0प्र0 में महिला ंिहसा को लेकर हाहाकार मचा हुआ है व बहुचर्चित बदायूं में दो बहनों को बलात्कार के पश्चात पेड़ पर लटकाए जाने वाले में राजनैतिक पार्टीयां द्वारा काफी रोटियां सेकी जा रही है। लेकिन पूरे देश व प्रदेश महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों की रोकथाम के लिए इन राजनैतिक दलों के पास कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है और न ही आंदोलन करने की कोई रणनीति है। जब महिलाए बलात्कारी को गिरफ्तार करने के लिए थाना चोपन को पांच दिन से घेरे हुई थी उस वक़्त एक भी राजनैतिक दल का नेता, विधायक या सांसद इन महिलाओं से मिलने के लिए नहीं आया व न ही किसी ने दलित महिला के मुददे का समर्थन किया। यहां तक कि पत्रकार व किसी भी अन्य प्रबुद्ध ताकतें भी इस मसहले पर सामने नहीं आई सिवाय दैनिक जागरण द्वारा 7 जून को एक छोटी सी रिपोर्ट प्रकाशन के। यह लड़ाई केवल समुदाय की महिलाओं ने अपने बलबूते लड़ी व जीती। यहीं नहीं इस थाना घेराव के मौके पर महिलाओं ने पुलिस व स्थानीय दबंगों द्वारा किए जा रहे अन्य अत्याचारों का भी हिसाब किताब चुकता किया। संगठन से जुड़ी महिलाओं जिले में वनाधिकारों व भूमि अधिकार के सवाल पर काफी आंदोलन लड़ रही है। थाना चोपन के ही अंतर्गत गुर्दा गांव के आदिवासीयों का एक ट्रेक्टर वनविभाग द्वारा एक महीना पहले चुनाव के दौरान जब्त कर लिया गया था व वनाधिकार कानून आने के बावजूद भी आदिवासीयों पर वनविभाग द्वारा अत्याचार ज़ारी था। इस मामले को भी महिलाओं ने थाना घेराव के समय उठाया व पुलिस पर दबाव बनाया कि आदिवासीयों के ट्रेक्टर को बिना शर्त रिहा किया जाए। इस आंदोलन का काफी असर पड़ा व आदिवासीयों के ट्रेक्टर को वनविभाग द्वारा वापिस कर दिया गया है।

महिलाओं ने यह दिखा दिया कि वे अपने बलबूते ही न्याय लेने के लिए सक्षम है अगर वो संगठित है तो। इसलिए महिला ंिहसा से लड़ने के लिए महिलाओं की एकता व महिला संगठनों को बनाना बेहद ही जरूरी है।

बलात्कार कांड की रिपोर्ट विस्तृत रूप से नीचे दी गई है।

रोमा
उपमहासचिव
अखिल भारतीय वनजन श्रमजीवी यूनियन

15 जून 2014

बलात्कारी कलवंत अग्रवाल को वारंट होने के बावज़ूद जनपद सोनभद्र, उत्तरप्रदेश थाना चोपन द्वारा गिरफ्तार न करने व सोनभद्र पुलिस द्वारा बलात्कारी को संरक्षण देने के विरोध में महिलाओं द्वारा थाना चोपन का घेराव, तीन दिन की मोहलत के साथ धरना पुनः अनिश्चितकालीन ज़ारी रखने के लिए ऐलान।

जनपद सोनभद्र के ग्राम बाड़ी, थाना चोपन के अवैध खनन क्रशर मालिक कलवंत अग्रवाल द्वारा सन् 2008 में ग्राम बाड़ी की एक दलित महिला का बलात्कार किया गया, जिसके तहत बलात्कारी पर धारा 376 व एसटी एससी की धारा 3(1) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। पिछले वर्ष आरोपी ने माननीय उच्च न्यायालय को गुमराह कर इस वारंट के खिलाफ़ स्टे आर्डर ले लिया था। जो कि केवल तीन सप्ताह के लिए मिला था। जिसकी अवधि नवम्बर 2013 में समाप्त हो चुकी है। आरोपी ने वारंट के तथ्यों को माननीय उच्च न्यायालय से छुपा कर स्टे ले लिया व स्थानीय थाने से ही सांठ-गांठ करके इस स्टे के माध्यम से बचता रहा। इस स्टे आर्डर की कापी सत्र न्यायालय सोनभद्र सीजेएम कोर्ट में पेश नहीं की गई, क्योंकि वहां उसका झूठ बेनकाब हो जाता। इस मामले में यह साफ है कि थाना चोपन के पुलिस कर्मियों व बलात्कारी के बीच मोटी रकम का लेन-देन हुआ है। यह तथ्य जांच का विषय है। अपने रसूख़ और पैसे के बल पर पुलिस पर अपनी धाक जमा कर कलवंत अग्रवाल द्वारा आए दिन पीडि़त दलित महिला को तरह-तरह से प्रताडि़त करना व उसकी नौजवान बच्चियों के साथ भी बलात्कार की धमकियां दी जाने लगीं। इस सब से दुखी होकर प्रताडि़त महिला द्वारा स्थानीय संगठन ‘‘कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर किसान संघर्ष समिति’’ की मदद से 6 जून 2014 को सैंकड़ों की संख्या में दलित आदिवासी महिलाओं को लेकर थाना चोपन का घेराव कर बलात्कारी को गिरफ्तार करने की मांग की। इस पर चोपन थानाध्यक्ष अशोक यादव ने यह दलील दी कि आरोपी द्वारा हाई कोर्ट से स्टे ले लिया गया है। जब संगठन की महिलाओं ने स्टे आर्डर की कापी मांगी तो थानाध्यक्ष अशोक यादव कापी का उपलब्ध कराने में नाकामयाब रहे व जब महिलाए जमी रहीं तो अंततः उनके द्वारा कोर्ट से ही सारे तथ्यों की जानकारी ले कर महिलाओं से वार्ता की गई। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि बलात्कारी द्वारा कोर्ट से तथ्यों को छुपा कर वांरट होने के बावजूद भी स्टे ले लिया गया व इस स्टे की अवधि पिछले वर्ष नवम्बर में ही समाप्त हो चुकी है। अब नया वारंट कोर्ट के माध्यम से करवाना पड़ेगा। जब थानाध्यक्ष पीडि़त महिला को वारंट कराने के लिए कहने लगे तब महिला अधिवक्ता रोमा ने कहा कि यह काम अब पीडि़ता का नहीं है, अब वारंट लाने का काम प्रोसीक्यूशन का है व हर हालत में एक दिन के अंदर स्वयं थानाध्यक्ष को कोर्ट जा कर बलात्कारी के खिलाफ वारंट ईश्यू कराना होगा। महिला संगठन के दबाव के चलते 7 जून 2014 को थानाध्यक्ष स्वंय सी0जे0एम कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुए जिसमें दलित महिला व उनके वकील भी मौजूद थे। सी0जे0एम कोर्ट द्वारा मामले की गंभीरता को भांपते हुए फौरन बलात्कारी के खिलाफ वारंट आर्डर दिया गया व थानाध्यक्ष को उक्त बलात्कारी को तत्काल गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए। लेकिन

जिले के पुलिस अधीक्षक व थानाध्यक्ष द्वारा इस मामले में अभी भी हीला हवाली की जा रही है व बलात्कारी को पूर्ण रूप से संरक्षण दिया जा रहा है। उसे भागने का पूरा मौका दिया गया। इस पर जब 9 जून 2014 से महिलाओं ने थाना चोपन पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया तो थानाध्यक्ष थाना छोड़ कर ही भाग गए। थाना चोपन के डाला चैकी इंचार्ज द्वारा महिलाओं से मिन्नतें की जाने लगीं कि उन्हें कुछ दिन की मोहलत दी जाए बलात्कारी को गिरफ्तार करने के लिए। महिलाओं ने नहीं माना तो 11 जून की रात करीब 12 बजे उपजिलाधिकारी व थाना विण्डमगंज के थानाध्यक्ष नरेन्द्र यादव द्वारा महिलाओं से वार्ता की गई। महिलाओं ने उन्हें दो टूक जवाब दिया कि जब तक बलात्कारी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा तब तक वे थाने से अपना धरना नहीं उठाएंगी। इस धरने से सोनभद्र की तमाम पुलिस सक़ते में आ गई व आला अफसरों तक में हलचल मच गईं। 12 जून को पुनः महिलाओं और पुलिस की वार्ता शुरू हुई, इस दौरान पुलिस कर्मियों द्वारा नाना प्रकार का लालच महिलाओं को दिया जाने लगा कि उनको पैसा दिया जाएगा, साड़ी दी जाएगी, उनको खाना खिलाया जाएगा आदि लेकिन महिलाएं अपनी बात पर अडिग रहीं। आखिर शाम 7 बजे उपजिलाधिकारी राबर्ट्सगंज द्वारा स्वंय आकर महिलाओं को आश्वासन दिया गया कि बलात्कारी को 3 दिन के अंदर ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा। राजकुमारी, हुलसी, बबनी, सोकालो, रमाशंकर व अन्य महिलाओं की अगुवाई में महिलाओं ने उपजिलाधिकारी से इस आश्वासन को लिखित रूप में मांगा। जिस पर उपजिलाधिकारी व थानाध्यक्ष विण्डमगंज से हस्ताक्षर सहित प्रमाण स्वरूप अपने पास रखा। महिलाओं ने थानाध्यक्ष विन्ढमगंज की उपस्थिति पर भी काफी नाराज़गी दिखाई व उसे यह कहा कि यह थाना चोपन का मामला है जो कि उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और अगर वो बलात्कारी को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी ले रहे हैं तो थाना विढ़ण्मगंज से स्तीफा दें और थाना चोपन में कार्यभार को संभाले। हांलाकि महिलाओं को इस बात का भरोसा नहीं था कि पुलिस बलात्कारी को गिरफ्तार करेगी, लेकिन तब भी अपने संगठन ‘‘कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर किसान संघर्ष समिति’’ व ‘‘अखिल भारतीय वनजन श्रमजीवी यूनियन’’ के माध्यम से तीन दिन की मोहलत पुलिस को दी गई। इस आश्वासन पर महिलाओं ने धरने को तीन दिन के लिए समाप्त किया। एक दिन बीत जाने के बाद 13 जून को सांय थानाध्यक्ष नरेन्द्र यादव विंढमगंज द्वारा महिला कार्यकर्ता राजकुमारी को फोन पर झूठी खबर दी गई कि, बलात्कारी कलवंत अग्रवाल गिरफ्तार हो चुका है व अब उन्हें आगे आंदोलन करने की ज़रूरत नहीं है। इस तथ्य की सच्चाई को पता लगाने के लिए महिलाओं द्वारा कुछ अधिवक्ताओं व पत्रकारों से जानकारी ली गई तो पता चला कि यह खबर झूठी है। इस पर महिलाओं में काफी रोष है व उन्हें यह महसूस हो रहा है कि उनके साथ मज़ाक कर बलात्कारी कलवंत अग्रवाल को बचाया जा रहा है व महिलाओं को बेवकूफ बनाया जा रहा है। इस सब से सख्त नाराज़ महिलाओं ने 16 जून से पुनः अपने आंदोलन की शुरूआत करने की रणनीति बनाई है।

पुलिस अधीक्षक सोनभद्र द्वारा स्वयं बार बार यहीं कहा जा रहा है कि आरोपी के पास हाई कोर्ट का स्टे है व तथ्यों की जांच करना होगा। उन्हें किसी कानूनी प्रक्रिया के कानून सम्मत तथ्यों के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं है। इन हालात् से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जनपद सोनभद्र के आला पुलिस अधिकारी भी बलात्कारी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। यह बात साफ ज़ाहिर हो रही है कि इस मामले में पुलिस फंसती नज़र आ रही है व अपने को बचाने के लिए रास्ते तलाश रही है। व महिला संगठन के इस आंदोलन से आंशकित है इसलिए आला अफसरों द्वारा संगठन के वरिष्ठ महिला कार्यकताओं को धमकी तक दी जा रही है कि अगर धरना समाप्त नहीं किया गया तो महिला कार्यकताओं के खिलाफ भी वारंट निकाले जाएगें। इस वार्ता की आडियो रिर्काडिंग महिला कार्यकर्ता के पास उपलब्ध है। इस पूरे घटना क्रम से यह बात साफ निकल कर सामने आ रही है कि उत्तरप्रदेश में बावजूद इसके कि सरकार द्वारा निंरतर इन घटनाओं को तत्काल संज्ञान में लेकर कार्यवाही करने के निर्देशांे को पुलिस अधिकारीयों द्वारा ताक पर रखा जा रहा है, व पुलिस द्वारा एक अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने की कोशिश की जा रही है।

दलित महिला के साथ बलात्कार करने की पृष्ठभूमि बलात्कारी कलंवत अग्रवाल द्वारा दलित महिला की ज़मीन हथियाने से जुड़ी है। उसकी भूमि को हथियाने के लिए यह बलात्कारी उसे तरह तरह से प्रताडि़त करते चला आ रहा है। उक्त दलित महिला की भूमि चोपन-डाला मुख्य मार्ग पर ठीक वैष्णो देवी मंदिर के बगल में स्थित है। दलित महिला के पति को 2008 में झूठे आरोप में कलवंत अग्रवाल द्वारा फंसा कर जेल भेज दिया गया व इस वहशी दरिंदे ने मौका पा कर घर में घुस कर दलित महिला का बलात्कार किया। महिला ने तमाम प्रताड़ना सहने के बावजूद भी हार नहीं मानी व अदालत में 156 (3) के तहत बलात्कारी पर मुकदमा क़ायम किया। इस मुकदमे के क़ायम होने के दो साल बाद मुलजि़म को गैर ज़मानती वरांट ज़ारी हुआ और कुर्की के आदेश भी न्यायालय द्वारा दिए गए। आरोपी को गिरफ्तार न करने के लिए थाना चोपन को शो कास नोटिस तक ज़ारी किया गया, लेकिन पुलिस के संरक्षण व तालमेल के कारण यह बलात्कारी बेख़ौफ घूमता रहा व दलित महिला व उसके परिवार वालों को आए दिन धमकियां देने का काम करता रहा है, कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बलात्कारी द्वारा अपने रसूख़ व पैसे के बल पर स्थानीय थाना पर अपनी गिरफ़तारी पर रोक लगाने के लिए बड़े पैमाने पर पैसे का लेन देन किया गया है। दलित महिला द्वारा पिछले तीन वर्षो से इस बलात्कारी के आंतक से बचने के लिए स्थानीय संगठन कैमूर महिला किसान मज़दूर संघर्ष समिति व अखिल भारतीय वनजन श्रमजीवी यूनियन से जुड़ कर इस मामले को लड़ा जा रहा है। पिछले वर्ष मार्च में सैंकड़ों दलित आदिवासी महिलाओं द्वारा थाना के समीप ही सोन नदी के किनारे थानाध्यक्ष अशोक यादव को इस मस्अले पर बड़ी जनसभा में बुला कर बलात्कारी को गिरफ्तार करने के लिए निवेदन किया था व ऐसे कई आवेदन जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक को दिए गए। उसे गिरफ्तार करने के बजाय पुलिस द्वारा उसे बचाने के लिए गैरकानूनी रूप से संरक्षण दिया गया व यहां तक बलात्कारी द्वारा जो न्यायालय को गुमराह किया गया, उसमें भी सोनभद्र की पुलिस द्वारा मदद की गई। तत्पश्चात् दिसम्बर 2013 में दलित महिला के साथ यूनियन के महिला प्रतिनिधिमंडल द्वारा दिल्ली में अनूसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री पी0एल पुनिया से मिल कर इस मामले पर कार्यवाही करने की मांग की थी। जिन्होंने इस मामले को लेकर उ0प्र0 सरकार व जिलाधिकारी को एक पत्र भी लिखा था। लेकिन आयोग की इस जांच को भी स्थानीय अधिकारियों द्वारा दबा दिया गया। इस मामले में दलित महिला की मदद करने वाली यूनियन व संगठन द्वारा उच्च न्यायालय में आरोपी व सोनभद्र की पुलिस की सांठ-गांठ को सही तथ्यों के साथ अवगत कराएगी व माननीय मुख्य न्यायाधीश को इस मामले में अलग से लिखेगी। साथ ही इस मामले में उ0प्र0 के मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव को भी फैक्स कर अवगत कराएगी।

रोमा
उपमहासचिव
अखिल भारतीय वनजन श्रमजीवी यूनियन

Saturday, March 22, 2014

Massive Rally By the Independent Trade Unions and Social Movements on 23rd March 2014, Jantar Mantar, New Delhi, India to celebrate the Martyr's Saheed-e-Azam Bhagat Singh Death Annivarsary. Pl join in large numbers. 

Political Statement - from the meeting of groups in Delhi on the 22/23-02-2014


As a follow up of the Jashn-e-Sangharsh of movements, activists and community leaders along with cultural groups, held in Chirala (Andhra Pradesh) in January 2014 a political meeting of people’s movements, organised and unorganised sector trade unions and traditional natural resource based community representatives was held on the 22nd and 23rd February 2014 in Delhi.

The existence of social movements and trade unions dates back to the history of left movement in India itself. The mass organisations and trade unions in the country, affiliated to a party or otherwise, have played very important role in deciding the future of government formation at the centre and the states and it is important that we take this historic opportunity to assert our militant unity and radical positions and re-emphasise the importance of social movements and its political views outside of the electoral politics.

Discussions within social movements, trade unions and the larger left constituency, in the context of the 2014 parliament elections in India, must bring in debates and dialogues around the leading political parties along with an analysis of the emerging political trends.

Some of the main positions taken during the meeting were to recognise that:

The times demand new political coalitions and alliance-building amidst social movements and between people’s movements and trade unions, bringing together the diversity of our political history as represented through the Red, Green and Blue flags! New political formulations that weave through class, gender and caste, organised and unorganised, environment and human must be found.   

This coalition must be built on the basic ideological premise of our collective opposition against global capitalism, brahmanism, feudalism, patriarchy, religious fundamentalism and jingoistic nationalism.

The need to effectively tackle and take forward the political resurgence of the past ten years, since 2004 WSF Mumbai, Sangharsh 2007 and the new political uprisings since 2000s, like; Nandigram, Singur, Mundra, Raigad, hilly terrains of Himachal Pradesh and Uttarakhand, Latehar, Chengara, Haripur, Nayachar, POSCO, Niyamgiri, Odisha and Andhra coastal regions, Kudankulam, Kalinga Nagar, Jashpur, and Sonbhadra, Bundelkhand, khiri, Maruti workers, unorganized labour struggles led by the communities and workers themselves, which are exemplary examples of this

At a time when people’s struggles are directed against the state-corporate nexus, there is a need for building a national joint platform of social movements and trade unions especially in the context of the upcoming Lok Sabha elections 2014.

The battle against patriarchy, and its manifestations in the physical and structural violence against women, should be strengthened through strengthening women’s role in family, society, movement and political dialogue

There is a historical need to re-assert the lives of leaders of political resistance and social change, like: Birsa Munda, Tilka Majhi, Sidhu Kanu, Ayyankali, Periyar, Savitribai Phule, Gandhi, Bhagat Singh, Ambedkar, Lohia and Jayaprakash Narayan


It was decided that the efforts to build this sort of a political alliance must be made immediately, especially in the run up towards General Elections 2014.

1.      The need for evolving a joint agenda and rationale in the political dialogue with political parties, in the run up to the elections
2.      The participation of critical mass-based movements in the election process – focus being agenda-setting with movement demands
3.      The realisation that movements and groups must engage with greater clarity, in a multi-party political democracy, to put forth our issues, concerns and ideological demands to a cross-spectrum of political groups
4.      The realisation that some of the movement groups and leaders have decided to join the electoral process and to contest elections themselves. The situation needs understanding, but should not be allowed the space of political interpretation that all social movements and trade unions are with one political party
5.      The realisation that the decades old struggles of social movements & trade unions and centuries old struggles of natural resource-based traditional communities – especially Dalits & Adivasis, have a collective strength that is rooted in the politics of being in the opposition, asserting the rights of people in the fight against the state. This must not be diluted.

Hence, there is a need to unite our demands and assert the fact that we are not pleading for legislations or to have our people in parliament or for our demands to be heard but we are wanting a political dialogue on each of these issues and will soon be aiming towards drafting a people’s charter on these lines.

It was decided to give a call for a national level mobilisation of representatives, leaders, activists and cultural movements to assemble in Delhi on the Shaheed Diwas, the commemoration day of the martyrdom of Shaheed Bhagat Singh and his comrades. The day will mark a political rally of Adivasi and Dalit groups, forest workers, fishworkers, handloom weavers, domestic workers, street vendors and hawkers, women’s groups and organisations that have been working in the country for social and political change. 

The rally on March 23, 2014 will start from Shaheed Park in Delhi, and will culminate in Jantar Mantar, in front of the Parliament. Leaders from other peoples’ organizations and from Political parties will also be invited. The group is going to do this action as SANGHARSH 2014. A brainstorming and strategy action planning meeting of activists, community leaders, solidarity groups, etc. will be held on the following day, 24th March, 2014 in Delhi. 





संघर्ष-2014 का आह्वान
दिल्ली चलो-दिल्ली चलो
 इन्क़लाब जि़न्दाबाद                                                                           अमर शहीदों को कोटि-कोटि श्रद्धांजलि
 साम्राज्यवाद का नाश हो                                                                                दुनिया के मेहनतकशो एक हो                                                     

हवा  में  रहेगी  मेरे  ख़याल  की  बिजली
ये मुश्त-ए-ख़ाक़ है  फ़ानी  रहे रहे ना रहे

23 मार्च शहीद दिवस पर विशाल रैली
शहीद पार्क(फिरोजशाह कोटला मैदान) से जन्तर-मन्तर तक

      दबेगी कब तलक़ आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक़ जज़बात-ए-बरहम हम भी देखेंगे
     चलो  यूं ही सही ये जोर-ए-पैहम हम भी देखेंगे 

साथियो!
23 मार्च को देश के कोने-कोने में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन आज से 83 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय आज़ादी के क्रान्तिकारी आंदोलन के पुरोधा शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने लाहोर सेन्ट्रल जेल में अंग्रेजी साम्राज्यवाद को चुनौती देते हुए इन्क़लाब जि़न्दाबाद का नारा बुलन्द करते हुए हंसते-हंसते फांसी का फंदा गले में डालकर शहादत दी थी। राष्ट्रीय आजादी के आन्दोलनों के लम्बे इतिहास में 23 मार्च का शहादत दिवस एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अंग्रेजी शासक वर्ग और भारत की प्रभुत्ववादी शक्तियों ने मिलकर एक साजिश के तहत सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख कर एक हड़बड़ाहट के साथ इन तीनों क्रान्तिकारियों का फांसी देने का फैसला लिया। केवल ये तीन शहीद ही नहीं बल्कि उनके राजनैतिक संगठन हिन्दोस्तान की समाजवादी प्रजातान्त्रिक संगठन (हिसप्रस) के कई अन्य महत्वपूर्ण साथियों को भी काकोरी कांड के तहत इसी दौर में जल्दबाजी में फासी की सजा दी गई थी। जिनमें प्रमुख नाम रामप्रसाद बिस्मिल, अश़फाक उल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लहरी व रोशन सिंह थे। हिसप्रस के सर्वोच्च नेता चन्द्रशेखर आज़ाद भी इसी दौर में इलाहाबाद में हुई एक मुठभेड़ में शहीद हुए थे। नेतृत्वकारी साथियों के शहीद हो जाने से बाद में हिसप्रस भी खत्म हो गई थी। आखिर क्या वजहा थी, कि इन क्रान्तिकारी नौजवानों को मिटाने के लिए अंग्रेज शासक और भारत की प्रभुत्ववादी शक्तियों में इतनी हड़बड़ाहट थी? इन क्रान्तिकारी साथियों को श्रद्धांजलि देते वक्त हमें इसके कारणों को भी समझना होगा। क्योंकि ये नौजवान ना तो किसी बड़े घराने से तआल्लुक रखते थे, ना इनका संगठन इतना ताकतवर दिखने वाला था और ना ही वे विलायत से उच्च शिक्षा प्राप्त कर के आए हुए साहबज़ादे थे। दरअसल अंग्रेजी शासकवर्ग उनके क्रान्तिकारी विचार और उन विचारों के प्रति निष्ठा और अदम्य साहस से बौखला गए थे व भयभीत हो गए थे। वो एक ऐसा वक्त था जब भारत की मुख्यधारा की राजनीति के नेतागण अपनी समझौतावादी राजनीति के चलते अंग्रेजों के साथ समझौते की प्रक्रिया शुरू कर रहे थे। जलियांवाला बाग के सुनियोजित नरसंहार के बाद देश का तत्कालीन नेतृत्व साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन से हटकर बगैर टकराहट की राजनीति को अपना रहा था, जिससे आम जनता में मायूसी छा रही थी। इसी मायूसी के अन्दर से निकलकर एक नयी नौजवान क्रान्तिकारी पीढ़ी पैदा हुई, जिसने शहीद-ए-आज़म भगतसिंह और शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की अगुआइ में अंग्रेजी शासकों को भारत से भगाने की चुनौती दी थी और अपने राजनैतिक दस्तावेज में आज़ाद भारत की राष्ट्रीय आज़ादी के लिए राजनैतिक कार्यक्रम भी दिए थे। जिससे देश के करोड़ों गरीब, किसान, मजदूर और नौजवानों में एक नयी उम्मीद ंजगी थी और दूसरी ओर जिससे अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गई थीं और इसी स्थिति से घबराकर इन्होंने पूरी बेरहमी के साथ इन क्रान्तिकारी नौजवानों की संगठित हत्या की थी। ठीक इसी तरह 18वी और 19वी शताब्दी में इन्होंने देश के आदिवासी महानायकों तिलका माझी, सिद्धु-कानू, सीतारमैया राजू व बिरसा मुंडा की भी हत्या की थी। इन क्रांतिकारियों को तो अंग्रेजों ने शहीद कर दिया लेकिन इनके विचारों को वे शहीद नहीं कर पाए, जो कि देश के कोने-कोने में फैल गए और जो आज भी भारत और पाकिस्तान की हर नयी पीढ़ी को प्रेरित करते हैं व एक शाश्वत शक्ति की तरह आज भी मौज़ूद हैं। इन महान क्रांतिकारियों का दिया हुआ इंक़लाब जि़न्दाबाद का नारा आज भी भारत-पाकिस्तान के तमाम गाॅवों-शहरों में हर आंदोलन में गूंजता है। साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में शहीद-ए-आजम भगतसिंह और उनके साथियों ने भारत नौजवान सभा और बाद में हिसप्रस के ज़रिये से एक स्पष्ट राजनैतिक विचार को स्थापित किया था, जिसने बाद में वामपंथी आंदोलन को भी एक नई ज़मीन दी थी। उन्होंने इससे पहले के अंग्रेज़ विरोधी क्रान्तिकारी जो कि ज़्यादहतर धार्मिक भावनाओं के आधार पर प्रेरित होते थे, उनसे अलग हटकर एक वैज्ञानिक और तार्किक वामपंथी विचारधारा की परम्परा शुरू की थी, जो कि आज भी प्रासंगिक है। खासकर उन्होंने अपने बलिदान को राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके एक नया प्रयोग किया था, जो कि अनोखा था व जिसे बाद में अन्य क्रान्तिकारियों ने भी अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर अपनाया। इसी वास्ते शहीद भगतसिंह को शहीद-ए-आज़म की आख्या मिली थी, आज भी वे जनमानस में 23 साल के एक नौजवान के रूप में ही जिन्दा हैं।
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे दिल पे निसार
                             तेरी कुरबानी  का  चर्चा  गैर  की  महफिल  में  है  -शहीद रामप्रसाद बिस्मिल
जिस राजनैतिक संकट की परिस्थितियों का सामना इन महान क्रान्तिकारियों ने किया था और एक सही आज़ादी के लिए एक नये आंदोलन का मार्गदर्शन किया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि उस समय में था। आज़ादी के 67 साल बाद भी आज वैसा ही राजनैतिक संकट और अनिश्चयता देश में फैली हुई है। आज भी देश की मुख्यधारा के राजनैतिक नेतृत्व समझौतावादी राजनीति का शिकार हैं और साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतशाही के सामने घुटने टेक रहे हैं और इस विशाल देश के अपार संसाधनों और मानव शक्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के सामने गिरवी रखने के लिए तैयार हैं। जनशक्तियों को ताकतवर बनाने के बजाए अन्तर्राष्ट्रीय पूंजीवाद, सामंतशाही और पितृसत्तावाद को ताकतवर बना रहे हैं। जिसके कारण देश के करोड़ों मेहनतकश और वंचित लोगों का भारतीय राजनैतिक नेतृत्व से विश्वास टूट चुका है, चाहे वो सत्तापक्ष हो या विपक्ष हो दोनो एक ही पाले में खड़े हैं। देश के लोगों की गिरती हुइ हालत से इन्हें कोई सम्वेदना नहीं है। देश की जनता की आकांक्षाओं को और मांगों को बड़ी बेरहमी के साथ कुचल रहे हैं। शासन-प्रशासन व्यवस्था लगभग टूट चुकी है और आम जनता के साथ सम्वादहीनता की स्थिति पैदा हो गयी है। चुनावकाल में इस सम्वादहीनता को तोड़ने का महज दिखावा भर किया जाता है। वो भी ऊॅचे-ऊॅचे मंचों और मीनारों से सुरक्षाओं के घेरे में रहकर जनता को झूठी दिलासा देने की कोशिश की जाती है, लेकिन जनता के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बता पाते। केवल नसीहत और हुंकार भरे प्रवचन ही दिए जाते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि इस शासनिक-प्रशासनिक ढांचे में लोगों का विश्वास नहीं है और ये लगातार टूटता जा रहा है, जिससे एक अराजकता की स्थिति पैदा हो रही है और ये अराजकता की स्थिति क्या करवट लेगी इसपर भी एक अनिश्चियता बनी हुई है। इस अनिश्चियता की स्थिति से निकलने के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण की ज़रूरत है। ऐसा दृष्टिकोण जो एक नई व्यवस्था कायम कर सके, एक जनोन्मुखी व्यवस्था को कायम करना इस समय सर्वोपरि है। ऐसी व्यवस्था केवल समाजवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्था ही हो सकती है। महान क्रान्तिकारियों का विचार भी ऐसा ही था। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनके संगठन का यही मानना था कि साम्राज्यवाद, सामन्तवाद और पूंजीवाद से सम्पूर्ण मुक्ति के लिए समाजवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्था क़ायम करना ज़रूरी है। स्मरण रहे कि राष्ट्रीय आज़ादी आन्दोलन में सर्वप्रथम इसी संगठन ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना का राजनैतिक दृष्टिकोण रखा था, उन्होने स्पष्ट रूप से कहा था यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था समाजवादी लक्ष्य के साथ ही होनी चाहिए अर्थात बिना समाजवादी विचारों के प्रजातांत्रिक व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती और ना ही मेहनतकश तबकों को ताकतवर बना सकती है। यह विचार आज और भी ज्यादा प्रासांगिक है। पूंजीवादी व्यवस्था कोइ प्रजातान्त्रिक व्यवस्था नहीं दे सकती, क्यूंकि आज वैश्विक पूंजीवाद खुद ही भारी संकट में है और इसने जनता के ऊपर किए जा रहे दमन को और बढ़ा दिया है। इसी संकट और दमन से मुक्ति पाने के लिये आज के दौर में समाजवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम करने के विचारों को पुख्ता करना पडेगा और व्यापक जनमानस में इस विचार को स्थापित करना होगा। चूंकि कोई राजनैतिक संगठन और यहां तक की मंुख्यधारा के वामपंथी राजनैतिक दल भी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने के लिये तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में जनसंगठनों को जो कि मेहनतकश और वंचित तबकों के लिए संघर्षशील हंै, उन्हे ही इस जिम्मेदारी को लेना पडे़गा, जनसंगठनों को सम्मिलित होकर इसी विचार को स्थापित करने के लिए एक जुझारू संघर्ष को सचेतन रूप से शुरू करना पडे़गा और इस राजनैतिक पहल से ही एक नए राजनैतिक संगठन का उदय होगा, जो आगे इस लडाई को अपनी मंजिल तक ले जायेगा।
साथियो! इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिये आज शहीद दिवस पर हम यह वादा करें कि हम सब मिलकर एक लड़ाकू आन्दोलन की शुरूआत करें, जो कि भारत में एक वास्तविक समाजवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम करने के लिए निर्णायक संघर्ष होगा। बिना जन-राजनैतिक आन्दोलन के कोई नई राजनैतिक प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकती है, ऐसा ही सबक हमें उन महान क्रान्तिकारी शहीदों ने दिया था, उन्होंने ऐसेम्बली हाल में बम फेंकते हुए जो पर्चा हवा में उड़ाकर बांटा था, उसमें उन्होंने स्पष्ट नारा दिया था कि ‘‘बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है’’ आज हमें उसी नारे को आगे ले जाना है। इस काम को शुरू करने के लिए सर्वप्रथम सभी जनसंगठनों को सामूहिक रूप से अपनी मागों को  व्यापक जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा, जिनके आधार पर एक राजनैतिक कार्यक्रम की शुरुआत की जायेगी।
शहीद दिवस के अवसर पर हम सभी संगठन मिलकर अपनी मांगों को प्रस्तुत करेंगे जिसमें सभी संघर्षशील जनसंगठनों के साथियों की भागीदारी अति आवश्यक है। आपसे अपील है कि शहीद दिवस के कार्यक्रम में शामिल होकर अमर शहीदों के विचारों को स्थापित करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु हज़ारों की संख्या में रैली में भाग लें।
                                                                                     इंकलाब जि़न्दाबाद
ये हंगाम-ए-विदा-ए-शब है अय ज़ुल्मत के फ़रज़न्दो
सहर  के  दोश  पर  गुलनार  परचम  हम भी देखेंगे
        तुम्हें  भी  देखना  होगा  ये  आलम  हम भी देखेंगे  -साहिर 
अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन, राष्ट्रीय मछुवारा संघ, राष्ट्रीय हाकर्स फेडरेशन,
कृषक मुक्ति संग्राम समिति-असम, दिल्ली समर्थक समूह।
हमारी मांगें है:
आजीविका की सुरक्षा; संसाधनों की सुरक्षा।
प्राकृतिक सम्पदाओं के ऊपर सरकारी मालिकाना के बदले सामुदायिक स्वशासन; ।
परम्परागत उत्पादक/दस्तकारों की सुरक्षा।
भूमि अधिग्रहण कानून का रद्दीकरण और वास्तविक ज़मीन जोतने वालों का भूमि अधिकार, आवासीय भूमि का अधिकार, सीलिंग और सरकारी ज़मीनों का भूमिहीनों में वितरण।
जमीन एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर महिलाओं का अधिकार
सत्ता का विकेन्द्रीयकरण; ग्रामसभा तथा मौहल्लासभा (शहरों एवं कस्बों) के सशक्तिकरण।
उद्योगों में ठेका-मज़दूरी प्रथा को समाप्त करना और श्रमिकों को नियमित करना।
समस्त हाकर्स के सार्वजनिक स्थानों पर सम्मान पूर्वक आजीविका के अधिकार को सुनिश्चित करना।
यूनियन, संघ बनाने के अधिकार को सुरक्षित करना।
विपक्षीय और त्रिपक्षीय सामूहिक समझौते की प्रकिया को मजबूत करना।
समस्त श्रमजीवियों के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना पूर्णतया लागू करना, सम्मान पूर्वक वृद्धा पेंशन योजना को लागू करना।
सम्मान से जीने लायक वेतन सुनिश्चित करना।
बिना विस्थापन के औद्योगीकरण नीति तय करना।
निजी कम्पनी-सरकारी सहभागिता प्रोजेक्टों को समाप्त करना और सार्वजनिक उद्योगों को मज़बूत करना।
समस्त बड़ी कम्पनियों द्वारा बैंक से लिए गए कर्जों को सरकारी वित्तीय संस्थानों द्वारा समयबद्ध वापस लेना।
समस्त वंचित तबकों के लिये सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना (राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक)।
सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सख्त कानून लागू करना।
सभी के लिये शिक्षा सुनिश्चित करना, सरकारी स्कूलों को नियमित रूप से चलाना, शिक्षा के निजीकरण को रोकना, ब्लाॅक/ताल्लुका स्तर पर तकनीकी शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करना।
गाॅव स्तर तक प्रभावी स्वास्थ सेवायंे सुनिश्चित करना।
शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना।
उर्जा की वितरण प्रणाली तथा प्रयोग में जनवादीकरण सुनिश्चित करना।
निरस्त्रीकरण और पडोसी देशों के साथ शान्ति क़ायम करना।
गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को पुनः स्थापित करना।


Monday, February 10, 2014



Present political situation and general election 2014 – new initiative from peoples movements

9th February 2014, Lucknow, UP

As we are all aware that the political situation in India is changing very fast. The whole nation is passing through a decisive phase affecting all sections of people. As the election date is getting nearer, there is lot of turmoil in the political scenario where polarization of political forces has already been started. Alignment and re-alignment of various political and social forces have been going on simultaneously. As a result debates on future political scenario have been going on at a wider level. But still uncertainty about post electoral scenario persists very strongly.
General election is the time when wider political space is created. This is the time when negotiations among various political parties and at the same time dialogue between political parties and people also take place. Alignment amongst social forces also takes place during this period. It is evident that 2014 general election will play a decisive role in framing the future course of the country as a whole. At a time when mass movements are getting strengthened almost in every corner of the country either in protecting the livelihood  and natural resources or against violence on women or against oppression on Adivasis , Dalits and Minorities, it is very important to see correlations of such movements ,in the context of people-state conflict. All these important issues and the struggles are directly related with the incumbent government and ruling alliances and will be so with the in - coming political powers. No doubt existing alliances will be replaced by new alliances of political forces. It is also evident in many struggling areas both in rural and urban areas that there exists a conflict between state and people. The main reason of this conflict is because of anti-people economic policies, absence of political will of the government for peoples’ welfare measures and that of bad governance. The dominant political forces have remained insensitive to the peoples’ demands for a radical change in the system. In this situation the common masses have become very aware about their economic, political and social demands and people want a fundamental change in the political system and they are not going to be satisfied with mere promises or packages. They want to see a concrete and realistic change of affairs in the system and so in the governance. Patch work or fixing will not work anymore. Political parties also have a sense of this reality but are not being able to accept their failures directly and to admit that this system will not work anymore. Even in the presidential address on the eve of republic Day the President has also admitted that “hypocrisy and show business” will not work. Interestingly, he himself was in the government for a long period till some eighteen months back. There is an all round fear among the leading parties of incoming thrust from the people for total change of the system, which they are terming as anarchy. There is clear denouncement of the concept of welfare state (the President referred this as “charitable shop”) and also of the democratic right to protest. Dominant political forces are trying to show that this crisis of the system as crisis of individual leadership and a conscious effort has been going on  to redefine the electoral battle as battle between two leaders eg. Modi vs Rahul or Modi vs Kejriwal, as if existing leader is changed by another leader, everything will be settled. They are trying to mislead the people by showing it be a fight of individuals so that the issues which have come out from peoples’ movements would go in the back stage and the issues of dominant capitalist forces will become national issues. We are all aware that capitalist system, both at international and national level, is facing an irreversible economic and political crisis and they have no way out to get over this crisis and mainstream political leaders are shaky to face the common peoples’ assertions and hoping that corporate will help them to tide over the crisis. This is for the first time in our electoral history a party that is claiming to replace the present regime is openly advocating corporatization of the economy and religious nationalism and on the other hand the ruling party is advocating the continuing of corporate loot of resources in the name of development for the advancement of the nation. Chief claimants of power have no regard for the popular demands for sustainable livelihood, protection of resources, security and dignity of common people. Regional parties are also following the same track. There is clear conflict of interest between mainstream political parties and the peoples’ movements.

In this context it is important to note a new political party has emerged on the premise of social movements. Although this new political formation has not been able to present its political and economic and social programs fully before the people but undoubtedly it has created a new enthusiasm among some sections of our struggling people. At the same time it is also evident that the new political formation also is taking away the space created by the social movements. Independent and sovereign space for the social movements is critically important for the growth of mass political initiative and so it is equally important to protect this social space for the strengthening the democratic process within this diverse social reality. Dynamics of electoral politics and that of mass movements are different from each other. Movement groups can not and should not be carried away by the tide, however powerful it may be. No doubt social and workers' mass movements are getting vulnerable under continuous attack from the state but still we are primarily accountable to our constituencies and fraternity.
In fact, a similar situation is emerging like the situation which emerged in the last phase of emergency in 1977. In that period also people came out on the streets against the atrocious policies of the then Indira Gandhi government but no progressive forces and especially the left forces did not take any initiative to intervene in the changing political situation. Labour and social movements also could not make any effective intervention – as a result right-centrist and communal forces prevailed over the situation and became dominant in the future political process. Barring one or two exceptions most of the governments which came after 1977 followed the anti people policies. Within some years Congress came back to power and ultimately in 1991, the then minority government led by Congress initiated the liberalization process and by marginalizing the labour and weaker sections, strengthened the capitalist and communal forces.
 It is therefore pertinent that social movements and independent labour movements should come together to unite the forces of diverse peoples’ movements and to intervene in the changing political situation positively and decisively. It should come out openly with the popular demands to engage with political forces to initiate a process of meaningful changes in the system. But before initiating any engagement with political parties it is necessary to discuss among the movement based organizations mutually and collectively so that a collective and sustainable process of political dialogue can be initiated. Collective effort is necessary for any such process to be effective. Diversity within the movement and its demands needs to be combined so that it can become a political demand from the social and labour movements. Separate initiatives, however sincere, will not be effective. Recently, a prominent social movement alliance has decided to join the new political formation on its own which has created a sort of crisis situation within the social movement. Now it is necessary for social and labour movements to come together to create an independent political constituency representing diverse tendencies in the people’s movements. It is imperative that such action has to be collective and as broad as possible. We must start this now or never. 

Concerning issues for campaign (Suggestions):

·         Protection of livelihood and resources
·         Community governance over natural resources instead of state ownership
·         Protection of  traditional producers/artisans
·         Abolishment of land acquisition act and establishing land rights to actual tillers and right for homestead land; distribution of surplus land to landless; ensuring women’s right over land and other natural resources.
·         Power to gram sabhas and mohallah sabhas (for urban semi- urban areas)
·         Abolishment of contract labour system in industries
·         Protection of right to form unions, associations
·         Strengthening bipartite, tripartite collective negotiation system.
·         Ensuring living wage for all working people.
·         Ensuring social security system for all working population including old age population
·         New industrialization with zero displacement
·         Abolition of all private public partnership projects
·         Time bound recovery of corporate debt from public financial institutions
·         Ensuring social justice for all marginalized sections (political, economic, cultural)
·         Strict law against communal violence
·         Ensuring education for all; proper functioning of government schools; control of privatization of education; facilitating  technical education at block/taluka level
·         Ensuring proper health service up to village level
·         Ensuring community participation in health and education services
·         Democracy in usage of energy
·         Disarmament and peace with neighboring nations;
·         re-establishment of non-aligned foreign policy

                               

Long live the victory of Peoples' Struggle! Long Live,
 Long Live!

All   India   Union   of   Forest   Woring   People


                                                                             मौजूदा राजनैतिक परिस्थिति   और आम चुनाव   2014                                                                               ‘‘सामाजिक और श्रम आंदोलनों की नई पहल’’

9 फरवरी 2014, लखनऊ, उत्तरप्रदेश

 सर्व विदित है कि देश के अंदर राजनैतिक परिस्थिति बड़ी तेज़ी से बदल रही है और एक निर्णायक दौर में खड़ी हैं और भारतीय समाज का हर वर्ग इससे प्रभावित हो रहा है। देश में आम चुनाव की तारीख़ नज़दीक आने के साथ-साथ राजनैतिक माहौल में इस वक़्त काफी उथल-पुथल मची हुई है। यहां तक कि महामहिम राष्ट्रपति भी इस उथलपुथल की लपेट में आ गए। परिस्थिति को लेकर व्यापक चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। हमेशा चुनावी दौर एक ऐसा वक़्त होता है, जिसमें राजनैतिक दायरा बढ़ जाता है और मौज़ूदा राजनैतिक दलों के बीच समझौते होते हैं व पार्टी और लोगों के बीच भी वार्ता की परिस्थितियां बनती रहती हैं। साथ ही साथ सामाजिक दायरे में भी अलग-अलग तबकों के बीच वार्ताए होती रहती हैं। ऐसा आभास हो रहा है, कि 2014 में होने वाले आम चुनाव देश के भविष्य के लिए एक निर्णायक भूमिका निभाऐंगे।
इस समय देश के लगभग हर कोने में किसी न किसी मुद्दे पर जनांदोलन चल रहे हैं। चाहे वो अपनी आजीविका की सुरक्षा के लिए हों, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के संघर्ष हांे, महिला हिंसा का विरोध हो, आदिवासी दलितों पर किए जा रहे दमन के खिलाफ हों या अल्पसंख्यकों और खासकर मुस्लिम समुदाय पर साम्प्रदायिक हमले के खिलाफ़ हों। इन सभी मुद्दों पर देशभर में जनांदोलन ज़ारी हैं और ध्यान दिया जाए कि इन सभी समस्याओं का सम्बन्ध सीधा सरकार के साथ है। एक तरह से आंदोलनरत क्षेत्रों में चाहे ग्रामीण क्षेत्र हों या फिर शहरी क्षेत्र हों जनता के साथ सरकार का टकराव साफ-तौर पर सामने आ रहा है और इस टकराव के मुख्य कारण सरकारों की जनविरोधी आर्थिक नीतियां, राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव और ग़लत शासन प्रणाली हैं। इन्हीं मुद्दों पर आम जनता भी उद्धेलित है और व्यवस्था में एक बुनियादी परिवर्तन की मांग कर रही है। लेकिन देश की प्रमुख राजनैतिक शक्तियां जनता में उठ रही इस परिवर्तन की मांग को लेकर पूरी तरह से संवेदनहीन हैं। इसलिए अब जनता और राजनैतिक शक्तियों के बीच भी टकराव हो रहा है। जनता अब आश्वासन या पैकेज से संतुष्ट नहीं होगी। वो अब एक ठोस एवं व्यवहारिक परिवर्तन देखना चाहती है। लीपा पोती से अब काम नहीं चलने वाला, ये मंज़र साफ़तौर पर सामने आ रहा है । राजनैतिक क्षेत्र की पार्टियों में भी इस सच्चाई का आभास है, लेकिन वे खुलकर अपनी विफ़लता की सच्चाई को मान नहीं पा रही हैं, कि यह राजनैतिक आर्थिक व्यवस्था अब और चल नहीं सकती।  यहां तक कि राष्ट्रपति महोदय ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की जनता के लिए दिए गए अपने सम्बोधन में इस बात को क़ुबूल किया कि ‘‘अब राजनैतिक क्षेत्र में पाखंडता और दिखावा नहीं चलेगा’’। उल्लेखनीय है कि वे खुद अब से 18 महीने पहले तक एक लम्बे अरसे से शासन में रहे हैं। प्रमुख राजनैतिक दल परिवर्तन की इस आहट से सशंकित हैं और  इसे वे अराजकता का नाम देकर दरकिनार करना चाह रहे हैं। राष्ट्रपति महोदय  ने अपने अभिभाषण में कल्याणकारी राज्य को ‘‘दान देने वाली दुकान’’ कह कर नकारा है और विरोध करने के जनवादी अधिकार को भी। अर्थात जनता और सत्ता के बीच के जो द्वन्द्ध हैं, उसे ना स्वीकार कर वे असली मुद्दे से हट रहे हैं और यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि व्यवस्था का संकट महज व्यक्तिगत संकट है। जैसे कि एक नेता की जगह दूसरा नेता आ जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। और यह शक्तियां चुनावी संघर्ष को व्यक्तिगत नेतृत्व के संघर्ष में ही परिभाषित करना चाहती हैं, यानि या तो मोदी बनाम राहुल या मोदी बनाम केजरीवाल के रूप में दिखाना चाहती हैं। इस तरह से लोगों को भ्रमित करके जनसंघर्षो से निकले हुए मुद्दों को चुनावी दौर में पीछे हटा कर पूंजीवादी और प्रभुत्ववादी शक्तियों के मुद्दों को ही राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहती हैं। यह पहला मौका है जब सत्ता की दावेदार एक पार्टी खुलकर पूंजीवाद और धार्मिक राष्ट्रवाद की तरफदारी कर रही है और सत्ताधारी पार्टी पूंजीवादी लूट को विकास का नाम देकर देश को आगे बढ़ाने की बात कर रही है। सत्ता के इन बड़े दावेदारों के पास आम जनता का मुद्दा कोई मायने नहीं रखता है। ये देश की तमाम सम्पदा और लोगों को बड़ी बेशर्मी के साथ पूंजीवाद के हवाले करना चाहते हैं। ज़्यादहतर क्षेत्रीय दल भी इसी ढर्रे पर चल रहे हैं। मुख्य राजनैतिक पार्टियों और आम जनता के बीच एक दूरी बनी हुई है। जिसके चलते सामाजिक आंदोलन के आधार पर नये राजनैतिक दल का गठन भी हो रहा है। हांलाकि यह दल अभी भी पूरी तरह अपने राजनैतिक स्वरूप को जनता के समक्ष रख नहीं पाया है, लेकिन इसने एक सकारात्मक उत्साह ज़रूर पैदा किया है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी समझना ज़रूरी है, कि यह नया राजनैतिक दल कई सामाजिक आंदोलनों को समाहित कर उस जगह को संकुचित कर रहा है। सामाजिक आंदोलन की जगह और एक स्वतंत्र परिसर जनराजनैतिक पहल के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना एक जनपक्षीय राजनैतिक दल का बनना और इसलिए स्वतंत्र सामाजिक क्षेत्र को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। ताकि विविधतापूर्ण सामाजिक दायरे में जनवादी प्रक्रिया को मज़बूत किया जा सके। सामाजिक प्रक्रिया और चुनावी प्रक्रिया कभी एक गति से नहीं चलते।
देखा जाए तो 1977 में आपातकालीन स्थिति के आखिरी दौर में जो स्थिति बनी थी लगभग ऐसी ही स्थिति इस बार भी पैदा हो गई है। उस वक्त भी लोग सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ सड़क पर आ गए थे, लेकिन वैकिल्पक राजनीति के लिए किसी राजनैतिक शक्ति ने, खासतौर पर वामपंथी ताकतों ने भी मजबूती से उस राजनैतिक परिस्थिति में दख़ल नहीं  दिया था। मज़दूर और सामाजिक आंदोलन भी कोई विशेष दख़लअंदाज़ी नहीं कर पाए थे, नतीजतन दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक शक्तियां उस प्रक्रिया पर हावी रहीं और उसके बाद कुछ अपवाद छोड़कर जो भी सरकारें सत्तासीन हुईं, उन्होंने जनविरोधी नीतियों को ही चलाया। कुछ सालों बाद कांग्रेसी सरकार फिर सत्ता में आई और अंततोगत्वा 90 के दशक में उदारीकरण की नीति को लागू करके देश की तमाम श्रमशक्तियों को दरकिनार किया और पूंजीवादी और साम्प्रदायिक शक्तियों को बढ़ावा दिया। 
वक़्त का तकाज़ा है कि तमाम जनांदोलन सामाजिक आंदोलन तथा स्वतंत्र मज़दूर आंदोलन जो कि देश की अलग-अलग जगहो में आंदोलनरत हैं, उन्हें भी इस मौके पर राजनैतिक पार्टियों तथा समूहों के साथ अपनी मांगों को लेकर मज़बूती से बातचीत शुरू करनी चाहिए। लेकिन राजनैतिक पार्टियों से बातचीत शुरू करने से पहले तमाम आंदोलनों एवं संगठनों के बीच आपसी तालमेल व बातचीत बहुत ज़रूरी है, ताकि हम कोई सामूहिक और सार्थक प्रयास शुरू कर सकें। सामुहिकता के बग़ैर अलग-अलग तरीके से हम कोई प्रभावी कदम नहीं उठा सकते। आंदोलनों के अंदर एवं मांगों में जो विविधताएं हैं, उन्हें समाहित करना निहायत ज़रूरी है। इन दिनों एक प्रमुख जनआंदोलन के समूह ने अपने आप ही निर्णय लेकर इस नई राजनैतिक प्रक्रिया में खुद को सीधे शामिल कर लिया व सामाजिक आंदोलन में किसी हद तक एक संकट पैदा किया है। अब ज़रूरत इस बात की है कि अब सामाजिक एवं श्रम आंदोलन मिल कर आंदोलन के प्रतिनिधित्व में एक व्यापकता लाऐं ताकि इस तरह का संकट फिर पैदा न हो।
राजनैतिक पार्टीयों से बातचीत का आधार ‘‘पहले दो फिर लो’’ के सिद्धांत पर ही आधारित होना चाहिए। इसके लिए हमें देश में और अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूदा विद्यमान राजनैतिक परिस्थितियों का वस्तुगत आकलन करना चाहिए। साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे जनांदोलनों का भी एक वास्तिविक जायज़ा लिया जाना चाहिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम ने राजनैतिक हलके में एक जबरदस्त हलचल पैदा की है। अहम् बात यह है, कि वंचित तबकों में काम करने वाले सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों के बहुतायत साथियों में भी इस चुनाव के परिणाम ने एक परिवर्तन की उम्मीद जगाई है। अख़बार और इलैक्ट्रानिक मीडिया में भी इस परिणाम और उसके असर के विषय में टिप्पणियां और विश्लेषण छाए हुए हैं। रातों रात ‘‘आप’’ मीडिया में छा गई। ऐसे परिवर्तन की उम्मीद हमेशा उत्साहजनक होती है, लेकिन साथ-साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि अख़बारों की रिर्पोटों से हम इस भावना में कहीं बह न जाएं। हमें इस परिवर्तन के बारे में सकारात्मक रहते हुए वस्तुगत स्थिति को गंभीरता से जांचना चाहिए। नकारात्मक सोच हमें मदद नहीं करेगी। आखिर हम आंदोलनकारी लोग कोई विशेषज्ञ नहीं होते हैं, बल्कि सक्रिय जनसंगठनों के कार्यकर्ता होते हुए हमें व्यवहारिक रूप से इस घटनाक्रम को देखना होगा। हम सभी जानते हैं कि इस विशाल देश में राजनैतिक प्रक्रिया को एक ही तरह से नहीं देख सकते हैं, बल्कि क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर देखना होगा। लेकिन फिर भी इन विविधताओं के बीच विद्यमान एक सूत्र को देखना ज़रूरी है। क्योंकि तमाम विविधताओं के बीच जनांदोलनों में तालमेल स्थापित करके ही आंदोलनों का एक सामूहिक राजनैतिक स्वरूप बनता है। वरना यह आंदोलन अपने-अपने क्षेत्र में सशक्त होते हुए भी व्यापक राजनैतिक पटल पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाएंगे । इन आंदोलनों का दायरा क्षेत्रीय स्तर पर ही सीमित रह जाता है, इसलिए राजनैतिक सत्ता के सामने यह चुनौती नहीं बन पाते हंै और हमेशा असुरक्षित रहते हैं। आंदोलन भौगोलिक रूप से क्षेत्रीय हो सकते हैं, लेकिन राजनैतिक मांग व्यापक दायरे में ही की जा सकती है, इसलिए राजनैतिक मांगों के लिए सामूहिक प्रयास बेहद ज़रूरी है।
सर्वप्रथम हमें अपने संगठन के सदस्यों और तमाम आंदोलनों के प्रतिनिधियों के बीच सलाह-मशवरा करना होगा। हमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक परिस्थितियों को जनआंदोलन के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अनुभव के चश्मे से देखना होगा। यह उन क्षेत्रों के लिए और भी ज़्यादा ज़रूरी है, जहां पर समुदाय और सरकार के बीच सीधा टकराव है। ऐसे क्षेत्र में जनसंगठन संघर्षशील जनता के साथ सीधे तौर पर जुड़े रहते हैं और जहां मुख्य राजनैतिक पार्टियां सरकार के साथ होती हैं और जनता से एक अलगाव रखती हैं। अन्य और नई राजनैतिक शक्तियों को भी इस वस्तुगत राजनैतिक टकराव के आधार पर अंकलित करना होगा। क्या यह शक्तियां सिर्फ सरकारी दाता के रूप से आ रही हैं, जैसे कि मुख्य राजनैतिक पार्टियां करती रही हंै, या फिर आंदोलन की जो मांगें व संघर्ष हैं, उनके समर्थन में आ रही हैं। ऐसे क्षेत्र के लिए यह समझना ज़रूरी है कि इन क्षेत्रों में संघर्षशील जनता के अंदर एक राजनैतिक चेतना बन चुकी है और वो हर तरह के शोषण के खिलाफ मुक़ाबला करने के लिए तैयार है। अर्थात वो किसी के रहम-ओ-करम पर नहीं रहना चाहती है। ऐसे मुद्दों पर हमारे लिए राजनैतिक तबकों के साथ भी बातचीत करना ज़रूरी है, ताकि इन बुनियादी मुद्दों को व्यापक राजनैतिक चर्चा में शामिल किया जा सके। चुनाव का वक़्त ऐसी चर्चा शुरू करने का एक मौका देता है। इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम सर्वप्रथम अपने आंदोलनों के बीच मौज़ूदा राजनैतिक परिस्थिति के बारे में चर्चा करें, ताकि आगामी आम चुनाव के लिए कोई सामूहिक जनकार्यक्रम तय किए जा सकें।
रगों  में  दौड़ते  फिरने  के  हम  नहीं क़ायल                                                                                     जो आंख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है
                          -मिजऱ्ा असद् उल्ला खां ‘‘ग़ालिब’’                                                               (सन् 1857 के दौर में तब के राजनैतिक हालात् पर)
अभियान के लिये प्रमुख मुद्दे (सुझाव):-

ऽ    आजीविका की सुरक्षा; संसाधनों की सुरक्षा।
ऽ    प्राकृतिक सम्पदाओं के ऊपर सरकारी मालिकाना के बदले सामुदायिक स्वशासन; ।
ऽ    परम्परागत उत्पादक/दस्तकारों की सुरक्षा।
ऽ    भूमि अधिग्रहण कानून का रद्द और वास्तविक जमीन जोतने वालों का भूमि अधिकार; आवासीय भूमि का अधिकार, सीलींग और सरकारी जमीनों का भूमिहीनों में वितरण।
ऽ    जमीन एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर महिलाओं का अधिकार
ऽ    सत्ता का विकेन्द्रीयकरण; ग्रामसभा तथा मौहल्लासभा (शहरों एवं कस्बों) के सशक्तिीकरण।
ऽ    उद्योगों में ठेका-मजदूरी प्रथा को समाप्त करना और श्रमिकों को नियमित करना।
ऽ    यूनियन, संघ बनाने की अधिकार को सुरक्षित करना।
ऽ    विपक्षीय और त्रिपक्षीय सामुहिक समझोैते की प्रकिया को मजबूत करना।
ऽ    समस्त श्रमजीवीयों के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना पूर्णतय लागू करना, सम्मान पूर्वक वृद्धा पेंशन योजना को लागू करना।
ऽ    सम्मान से जीने लायक वेतन सुनिश्चत करना।
ऽ    बिना विस्थापन के उद्योगीकरण नीति तय करना।
ऽ    निजी कम्पन्नी-सरकारी सहभागिता प्रोजेक्टों को समाप्त काना और सार्वजनिक उद्योगों को मजबूत करना।
ऽ    समस्त बड़ी कम्पन्नीयों द्वारा बैंक को सरकारी वित्तीय संस्थानों से समयवद्य वापस लेना।
ऽ    समस्त वंचित तबकों के लिये सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना (राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक)।
ऽ    सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सख्त कानून लागू करना।
ऽ    सभी के लिये शिक्षा सुनिश्चित करना, सरकारी स्कूलों को नियमित रूप से चलाना, शिक्षा की निजीकरण को रोकना, ब्लाॅक/तालूका स्तर पर तकनीकी शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करना।
ऽ    गांव स्तर तक प्रभावी स्वास्थ सेवायंे सुनिश्चित करना।
ऽ    शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना।
ऽ    उर्जा का वितरण प्रणाली तथा प्रयोग में जनवादीकरण सुनिश्चित करना।
ऽ    निरस्त्रीकरण और पडोसी देशों के साथ शान्ती कायम करना।
ऽ    गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को पुनः स्थापित करना।


अखिल भारतीय वनजनश्रमजीवी यूनियन